उस भरोसे की गूंज अभी भी हमारे ज़ेहन में है

वो भी कुछ ऐसा ही सामान्य सा ही दिन था जब फेसबुक के हमारे इनबॉक्स में एक संदेश आया.

संदेश था- ”अभी तुम्हारा पोस्ट देखा. मीनाक्षी का कपड़ों से आर्ट बनाने के बारे में. दिल्ली में हो तो गूंज आ जाओ. हमें बहुत खुशी होगी अगर तुम्हारे प्रोजेक्ट में कपड़ा दे पाए तो. क्या पता यहां कपड़े और आर्ट से जोड़कर नए आइडिया भी मिलें.”

ये संदेशा था गूंज की मीनाक्षी गुप्ता का.(गूंज एक स्थापित और बेहतरीन काम कर रही संस्था है. एक ऐसी संस्था जिसने पूरी दुनिया में पुराने कपड़ों के मायने बदल दिए और अब कबाड़ को नया अर्थ दे रहे हैं.)

हम यानी मी और जे गूंज के काम के बारे में पहले से जानते थे. खासकर उत्तराखंड बाढ़ के बाद गूंज के काम को बहुत नज़दीक से देखने का मौका भी मिला और उसके बाद तो गूंज के प्रमुख अंशु गुप्ता को रैमन मैग्सेसे अवार्ड मिला तो पूरी दुनिया ही उनको जानने लगी.

ये संदेश आया तो पहली बार लगा कि लोग वाकई आपका काम देख रहे हैं और पसंद कर रहे हैं. आपका काम नोटिस किया जा रहा है. हमने जवाब दिया और योजना बनाई कि हम गूंज ज़रूर जाएंगे.

बातचीत के बाद हमने मुलाकात का समय तय किया और हम तीनों ही पहुंचे मीनाक्षी गुप्ता से मिलने. मी जे और बुतरू. ये मीटिंग एकाध घंटे की थी लेकिन हम दिन भर गूंज में रूके रहे. उनका काम देखा और जैसा कि मीनाक्षी ने कहा था नए आइडिया भी आ गए और उस आइडिया को स्वरूप कैसे दिया जाए वो भी हमने तय कर लिया.

इस बैठक के दौरान मीनाक्षी और अंशू ने जो जो भरोसा मी पर दिखाया उसकी गूंज हमारे ज़ेहन में अभी भी है. हालांकि हम जहां भी आर्ट करने जाते हैं लोगों का प्यार मिलता है लेकिन अपने क्षेत्र में स्थापित लोग अगर आपमें भरोसा दिखाते हैं तो उत्साह बढ़ जाता है.

मी ने योजना बनाई कि गूंज की महिलाओं के साथ अब तक का सबसे जटिल और विशाल काम किया जाए कपड़ों के साथ. हमने आइडिया शेयर किया तो मीनाक्षी और अंशू ने कहा- तुम लोग जो भी करना चाहते हो करो.हमने तुम्हें सारा काम दिखाया गूंज का. अब आगे तुम्हें जो बनाना है बताओ.

चूंकि गूंज में लोगों के कंट्रीब्यूशन से आए कपड़े का एक एक सूत काम में लिया जाता है इसलिए हमने तय किया कि हम उन कपड़ों से काम करेंगे जिनका अब और कोई इस्तेमाल संभव न हो पाए.

(जो गूंज का काम जानते हैं उन्हें पता होगा कि लोग जो भी कपड़ा, सामान, किताबें, चीज़ें देते हैं गूंज में उन्हें ठीक कर के, सजा कर, संवार कर उन इलाक़ों में भेजा जाता है जहां लोगों को इनकी ज़रूरत होती है. गूंज के काम पर एक अलग से किताब लिखी जा सकती है)

तय हुआ कि हम तीन से चार दिन काम करेंगे और गूंज में काम कर रही अस्सी महिलाओं में से कुछ महिलाओं के साथ आर्ट बनाया जाएगा. मी का आर्ट का काम कम्युनिटी बेस्ड रहा है और ये कोई अनोखी बात भी नहीं है. दुनिया के कई आर्टिस्ट कम्युनिटी के साथ काम करते हैं. उनकी मदद से आर्ट बनाते हैं और दुनिया भर में शो करते हैं.

चूंकि मी का काम लेबर इंटेसिव था तो गूंज की महिलाओं के साथ काम करना एक सुखद संयोग था. उन महिलाओं के लिए और मी के लिए कपड़े उनकी त्वचा जैसे ही हैं. कपड़ों को अलग करना, उन्हें फाड़ना और फिर उनकी रस्सियां बनाना महिलाओं को खूब समझ में आ गया लेकिन तीन दिनों तक वो लगातार पूछते रहे कि इससे बनेगा क्या…इससे बनेगा क्या.

मी मुस्कुराती रही और कहती रही कि जो बनेगा आपके सामने ही बनेगा. इस काम के दौरान वही सब होता रहा जो किसी भी कम्युनिटी के काम में होता है. थोड़ी सी गॉसिप, ज़ोरदार हंसी, हल्की मुस्कुराहटें, बीच बीच में गाने, और चाय के दौर पर दौर. महिलाओं के मी से ढेर सारे सवाल. अमरीका में छोटा बच्चा कैसे रहता है. तुम इतनी जल्दी जल्दी कपड़ा कैसे लपेट लेती हो. अंग्रेज़ी भी बोल लेती हो और हमारी भाषा भी समझ लेती हो.

मीनाक्षी लगातार इस दौरान आती रहीं और देखती रहीं कि क्या बन रहा है. उन्होंने एक बार भी हस्तक्षेप नहीं किया कि क्या बन रहा है. बस आती देखतीं और पूछती कि खाना खाया या नहीं. मीनाक्षी के आने से एक बात ज़रूर होती थी. उनकी मौजूदगी में एक गर्माहट फैल जाती थी चारों ओर और लगता था सब लोग मुस्कुरा रहे हैं. ये मीनाक्षी कैसे कर पाती हैं…हम पूछना भूल गए.

अंशू अपनी व्यस्तता में भी समय निकाल कर काम होता हुआ देखते. पूछते कुछ नहीं. मुस्कुराते लेकिन उनकी आंखों की चमक कहती कि मैं देख पा रहा हूं तुम सभी को. अंशू कम बोलते हैं लेकिन जब बोलते हैं तो मार्के की बात बोलते हैं.

तीसरे दिन मी ने कपड़ों को एक जगह कर के वो आकृति बनानी शुरु की जो उसके दिमाग में शायद शुरु से होगी. इस आकृति को लकड़ी के स्वरूप में कटवाने से लेकर उसमें कब्ज़े लगवाने तक हर कदम में मी ने तय किया था कि कुछ छूटने न पाए. फिर शुरु हुआ उस पर कपड़े लगाने का काम. और धीरे धीरे एक आर्ट आकार लेने लगा.

कई घंटों की मेहनत के बाद जब ये तैयार हुआ तो एकबारगी लोग रिएक्ट नहीं कर पाए लेकिन मी को अनुभव था कि लोग अभी आकृति को समझ इसलिए नहीं पा रहे हैं क्योंकि वो ज़मीन पर है. फिर मी ने उसे खड़ा किया तो समझ आया कि एक भव्य आर्ट तैयार हुआ है.

फिर तो दौर चला तस्वीरों का. हंसी का ठहाकों का और विस्मय से देखने का उस आर्टवर्क को कि क्या हम सबने मिलकर ये बनाया है. हमारे साथ काम कर रही उन सभी महिलाओं के चेहरे पर खुशी महसूस की जा सकती थी. जिन्होंने अपने हर दिन के काम के बीच में से दो दिन निकाल कर एक आर्टवर्क बनाने में अपना योगदान किया था.

असल में हम सब आर्टिस्ट हैं. हमारा आर्टोलॉग के पूरे प्रोजेक्ट का मूल मंत्र भी यही है कि हर आदमी आर्टिस्ट है. चाहे वो गांव की कोई महिला हो या शहर की कोई हाउस वाइफ. दूर जंगल में बैठा कोई आदिवासी परिवार हो या फिर जेल में बैठे कैदी. हर आदमी आर्टिस्ट है. अगर ऐसा नहीं होता तो हम पिछले छह साल से लोगों के साथ आर्ट नहीं कर रहे होते.

गूंज का काम हमें इतना पसंद आया कि हमने अब तक वो फाइनल काम फेसबुक पर शेयर नहीं किया है. होता है न कोई चीज़ बहुत प्रिय हो तो शेयर करने में डर लगता है दुनिया से कि कहीं कोई चुरा न ले. कॉपी न कर ले.

खैर. अब ये काम आप सब की नज़र है.

नोट- निभा दी….हम तीनों यानी मी जे और बुतरू आपको मिस करते हैं.

 

2 thoughts on “उस भरोसे की गूंज अभी भी हमारे ज़ेहन में है

  • मैंने दिल्ली में अपने मोहल्ले में दर्जी के पास से कतरन ले जाते दो एक औरतों को देखा है. शायद वे इन कतरन से दरी,पायदान बनाती हैं. लेकिन ऐसी ही कतरन से इतना बड़ा आर्ट वर्क बन सकता है. इन कतरन के द्वारा जिंदगी रुपी चक्र को दर्शाया जा सकता है. जिंदगी की रंग-बिरंगी राहों को उकेरा जा सकता है. वो भी इतने सुंदर रूप से. ये नहीं सोचा था. इस आर्ट वर्क को समझना हमारे लिए थोड़ा मुश्किल है. ये तो हमारे लिए एक अजूबे की तरह है. बड़ा-सा लेकिन देखने में सुंदर लग रहा है. वैसे एक बात बोलूँ आपके काम का सबसे खूबसूरत पक्ष यही है कि आप अपने आर्ट वर्क में लोगों को जोड़ते हैं. इस ख़ूबसूरती को यूं ही बनाए रखिए और नए-नए प्रयोग करते रहिए और इधर डालते रहिए.

  • मैं शायद तभी नया नया जुड़ा था आपके साथ तो मैंने ये सब फ़ोटो मे देखा था, पर शायद फ़ाइनल क्या बनाया जा रहा है वो नही देखा था, या देखा हो। पर मैं भी सोचता था इतना कपड़ा पूरे फ़र्श पर फैला होता था,

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