History-Geography: Male-female

Series of works exploring idea of Purush-Prakriti

Despite Facebook being a non-serious medium, we find some serious writing on it at times. If some of these anarchic, spontaneous and unconnected posts are put together it becomes like a poem or a story.

At certain points Jey sushi’s writings becomes something like this which needs to be put in one place and when it is read together it gives an enormous insight.

In last few days Sushil has been using the metaphor of History and Geography to write about love, body, village-city, sexual relations, departure, meta-physics, doubt and internal logic of love.When we read these epigram type writings one can remember Ernesto-Cardenal. Cardenal’s epigrams were put-together reads like epics.

Like the parrot of Cardenal, Sushil creates the metaphor using his world of day to day. In Ernesto’s poem, Parrot was representing the common people facing the Imperialism of USA. Here Sushil history-geography Metaphor is explaining the softness and tragedy of Modern day Love.

Introductory text by Prithvi Parihar

Part of the series Purush-Prakriti which was based partly on history-geography writings

The writing by Jey Sushil

Every girl has a history and Every boy a geography. Though Every girl is interested in the history of boy and every boy is interested in the geography of a girl. On the rocks of these history and geography germinates…….the grass of LOVE.

Where the battle of history and geography ends…..borns a Philosophy..philosophy of a child.

I was bad in history. She was good in geography. Grass of love was way ahead of us and we fell in the arms of freud.

The heart keeps beating and becomes a bed….You keep writing and becomes helpless. I was running behind her geography and She was becoming my history.

Then One day History encircled the geography and they reached the garden of Eden. The moment geography was encircled..it gave birth to Mathematics and there began the journey of logic, physics and Metaphysics

In any big city every talk is small and in a small every talk is a big one. In a big city everything boils down to geography…in small city everything boils down to the history.

When geography changes, history gets made and new geography always asks about the old history but history is always interested in the Geography. History never asks geography about her history.

Its history’s curse to run behind Geography, catching her and then turn into history.

One day History started  telling his story to Geography. Geography turned back and changed her posture. History had never seen that graph and they again started growing gras….Grass of Love.

And then one day Geography told history that she wanted to read history. History had no answer to that. he started missing the last geography and stared the new one thinking why cant we grow some grass…..grass of love

The moment history gets a new geography, he wants to forget his history but geography is always interested in the history of the history.

History always wants to play geography and geography wants to play history. obviously Grass is always the looser in this….Grass of love.

Everything ended in the friction of History and Geography. Years past. The hands had wrinkles now. History was entangled in the history of geography and Geography was in love with the geography of history.

Meenakshi painted a whole series based on the history-geography writing in the year 2014

 

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This was originally written in 2013 and translated recently. Thanks to Avinash Chanchal who collected and put it in his blog in 2013. Also thanks to Prithvi Parihar who wrote the introductory text and contextualise the writing in a bigger canvas.

Here is the link if you want to read in hindi.

नर-मादा -इतिहास-भूगोल

Just copying the text here as well if someone wants to read it in Hindi here.

 

नर-मादा -इतिहास-भूगोल

 

डेनियल गोवर का स्केच


काफी अगंभीर मीडियम होने के बावजूद कभी-कभी फेसबुक पर गंभीर लिखावट अगंभीर रुप में मिल ही जाता है। एकदम स्पोन्टेनियस, अराजक, तितर-बितर तरीके से लिखे जाने वाले ये स्टेट्स अगर एक जगह इकट्टा कर दें तो एक पूरा का पूरा कहानी, उपन्यास या कविता जैसा कुछ हो जाता है।
बीच-बीच के अंतराल पर जे सुशील का लिखा भी कुछ ऐसा ही बन जाता है, जिसको एक जगह समेटने की तलब होने लगती है और फिर जब इसे पूरी समग्रता में समेट लो तो ये छोटे-छोटे स्टेट्स किसी कविता, कहानी या उपन्यास टाइप हो जाते हैं।

पिछले दिनों इतिहाल और भूगोल का मेटाफर रचते हुए जिस तरह उन्होंने प्रेम, देह, गांव-शहर, यौनिक संबंध, विछोह, मेट्रो फिजिक्स, शंका और प्रेम के इन्टरनल  लाजिक को लिखा है, इनको पढ़कर बरबस ही आपको ernesto-cardenal  याद आ जाते हैं।  एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएं एपिग्राम्स या फिर कहें सूक्तियों की तरह हमारे सामने आती हैं लेकिन इन एपिग्राम्स को एक जगह मिला दीजिए तो पूरा का पूरा एक एपिक या महाकाव्य आपके सामने होता है।

सुशील  एर्नेस्तो कार्देनालकी कविता तोते की तरह ही अपने आसपास की दुनिया को अपना मेटाफर बनाते हैं.
एर्नेस्तो की कविता तोते में साम्राज्यवादी अमरीका से त्रस्त जनता तोते के रुप में है तो सुशील के यहां आधुनिक प्रेम की मुलामियत और त्रासदी की कहानी इतिहास-भूगोल के मेटाफर में है।
पूरी लिखावट नीचे पढ़े-
हर लड़की का इतिहास होता है और हर लड़के का भूगोल…वैसे, हर लड़की को लडके के इतिहास में और हर लड़के को लड़की के भूगोल में रुचि होती है…इन भूगोल-इतिहास की चट्टानों पर प्रेम की दूब उग जाती है…इधर उधर छितर बितर।
 इतिहास और भूगोल की लड़ाई जहां खत्म होती है वहां दर्शन पैदा होता है….बाल-दर्शन।
.मैं इतिहास में पीछे था…वो भूगोल में आगे थी…दूब ने दोनों को पीछे छोड़ दिया…और हम फ्रायड की बांहों में झूल गए.
  धड़कते-धड़कते दिल दीवार हुआ जाता है…लिखते लिखते लिखना लाचार हुआ जाता है…। हम तो पड़े थे उसके भूगोल में, और वो अब इतिहास हुआ जाता है।
भूगोल में बैठ कर इतिहास लिखना कैसा होता होगा…और इतिहास में बैठ कर भूगोल के बारे में सोचना
  एक दिन इतिहास ने भूगोल को गोल कर दिया…भूगोल के गोल होते ही दोनों गार्डन के इडेन में पहुंच गए……
भूगोल के गोल होने से दूब सूख गई और फिर गोल गणित का जन्म हुआ जिससे फिर आगे चलकर लॉजिक, फिजिक्स और मेटाफिजिक्स की शुरुआत हुई।
बड़े शहर में हर बात छोटी होती है और छोटे शहर में हर बात बड़ी……वैसे बड़े शहर में हर बात भूगोल पर अटकती है….छोटे शहर में हर बात इतिहास पर।
  भूगोल बदलता है तो इतिहास बनता है और नया भूगोल पुराना इतिहास ज़रूर पूछता है लेकिन इतिहास को सिर्फ भूगोल में रुचि होती है. इतिहास भूगोल का इतिहास कभी नहीं पूछता।
  इतिहास की नियति है भूगोल के पीछे भागना..उसे पकड़ना और फिर उसे इतिहास में बदल देना
 एक दिन इतिहास ने भूगोल के सामने अपने इतिहास के पन्ने पलटने शुरु किए. भूगोल ने ये देखकर अंगड़ाई ली और अपना जुगराफिया बदला. जुगराफिया बदलते ही इतिहास का मुंह खुला का खुला रह गया और फिर दोनों मिलकर दूब उगाने लगे.
. …और फिर एक दिन भूगोल ने कहा इतिहास से कि मुझे तुम्हारा इतिहास पढ़ना है. इतिहास के पास इसका कोई जवाब नहीं था. उसे अपने पुराने भूगोल की याद सताने लगी और वह सामने के भूगोल को ताकते हुए सोचने लगा काश कि दूब उगने लगे फिर से…
नया भूगोल मिलते ही इतिहास अपना पुराना इतिहास भूलना चाहता है लेकिन भूगोल को हमेशा इतिहास के पुराने इतिहास में रुचि होती है
  इतिहास हमेशा भूगोल भूगोल खेलना चाहता है और भूगोल हमेशा इतिहास इतिहास . इस खेल में नुकसान हमेशा दूब का होता है.
  भूगोल इतिहास की रगड़ में सबकुछ खत्म हो चुका था. बरसों बीत गए थे. झुर्रियों पड़े हाथों में हाथ थे. इतिहास भूगोल के इतिहास में गुम था और भूगोल इतिहास के भूगोल के इश्क में उलझा हुआ-सा था

 

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