कुंडापुर में कृष्ण और अर्जुन

IMG_0689गोवा से कुंडापुर की दूरी ढाई सौ किलोमीटर के आसपास है और रास्ते में समुद्र की नमी महसूस होती है, नज़रें घुमाएं तो या तो खूबसूरत तट दिखते हैं या फिर घने जंगल.

इन सब को पार करते हुए कुंडापुर के नज़दीक पहुंचते ही समुद्र तट और बैकवार्टर्स का अदभुत नज़ारा देखने को मिलता है. इन्हीं नज़ारों के बीच हम पहुंचे कर्नाटक के उडुपी शहर से कुछ पहले स्थित कुंडापुर.

कुंडापुर में मालिनी अडिगा हमारा इंतज़ार कर रही थीं. मालिनी ने जेएनयू से प्राचीन इतिहास में पीएचडी की है और जेएनयू के ही किसी जानने वाले ने उन्हें हमारे बारे में बताया था.

मालिनी का कहना था, ” जब आप लोगों से बात हुई थी तो बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आप दीवारों पर इतनी सुंदर पेंटिंग करते हैं. जेएनयू के हमारे एक अच्छे दोस्त ने आप लोगों के बारे में कहा कि आप लोग कुछ पागलपन करते हैं और इस रास्ते में हमारे यहां ठहरना चाहते हैं तो मैंने हां कर दी थी.”

IMG_0602फिर तो बातों का सिलसिला ज़ारी हुआ तो मालिनी ने बताया कि उन्होंने हमारे ब्लॉग पढ़े हैं और उन्हें पुणे में की गई बुद्ध की पेंटिंग पसंद आई है

कला की बात चली तो मालिनी ने अपनी नानी के बारे में बताया जो गुड़िया बनाया करती थीं. मालिनी के घर में लगा अधिकतर सजावट का सामान उनकी नानी ने ही बनाया है.

चाहे वो तरह तरह की गुड़िया हो या फिर कैलेंडर की तस्वीरों पर ज़री और कागज़ का काम.

मालिनी की नानी सरोजिनी राव को कला का ऐसा जुनून था कि अस्सी की उम्र में वो तंजावुर शैली की पेंटिंग सीखने जाती थीं.

मीनाक्षी का मन हो गया मालिनी की नानी से मिलने का लेकिन पता चला कि वो पिछले साल गुज़र गई. तब उनकी उम्र 98 साल थी.

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कला और कलाकार की बात चली तो हमने मालिनी और उनके छोटे बेटे अमृत से पूछ ही लिया कि वो दीवारों पर क्या चाहेंगे.

मालिनी ने कहा, ” कृष्ण मेरे प्रिय भगवान हैं. क्या संभव है कि आप कृष्ण बनाएं. आसपास भी कृष्ण की ही तस्वीरें हैं.”

मीनाक्षी ने पहले कृष्ण और राधा की पेंटिंग बनाई है पर मीनाक्षी के राधा कृष्ण बिल्कुल अलग होते हैं…वो मछली रुप में होते हैं.

मुझे पता था कि मीनाक्षी यही सोच रही होगी तो मैंने टोका- ” राधा कृष्ण के अलावा कोई कृष्ण बने. क्यों न कुरुक्षेत्र में कृष्ण बनाया जाए.”

मीनाक्षी मेरा मन समझती है. उन्होंने तुरंत कागज़ कलम पर कुछ उकेरा और बात बन गई.

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दीवार पर काम शुरु हुआ मत्स्य रुप में कृष्ण और अर्जुन. कृष्ण का विराट रुप और नतमस्तक कृष्ण को समर्पित अर्जुन.

ज़ाहिर था कि मालिनी और अमृत ने पेंट करने में हाथ बंटाया.

मालिनी के पति मंजूनाथ पेशे से डाक्टर हैं. अत्यंत व्यस्त लेकिन वो भी बनती हुई पेंटिंग पर नज़र डालते रहे. एक रात उन्होंने मीनाक्षी को पेंट करते हुए देखा और बोले- ” इस लड़की के हाथ बेहद सधे हुए हैं. ये आगे चलकर बड़ी कलाकार बनेगी.”

बनती हुई पेंटिंग में रंग, मछली, कृष्ण अर्जुन छोड़कर सधे हाथों पर नज़र उसी की जा सकती है जिनके हाथ खुद भी सधे हों. मंजूनाथ जी लगभग हर दिन कान, नाक और गले से जुड़े आपरेशन करते हैं और अनुभवी डाक्टर माने जाते हैं इलाके के.

पेंटिंग लगभग पूरी हो चुकी थी और एक जगह बाकी थी. हमने सोचा क्यों न यहां कोई श्लोक लिखा जाए. हमारे मन में गीता के कुछ रटे रटाए श्लोक आ रहे थे और वो हमें पसंद भी नहीं आ रहे थे.

मालिनी ये सब सुन रही थी और उन्होंने कहा, ”क्या मैं कोई श्लोक बताऊं.”

हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला- ज़रुर ज़रुर.

फिर मालिनी ने गीता का अपना सबसे प्रिय श्लोक हमें बताया

मन्मना भव मदभक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु,

मामेवैष्यसि युक्त्वैवम आत्मनां मत्परायण:.

इसका अर्थ है- अपना ध्यान मुझ पर केंद्रित करो, मुझको समर्पित होओ, अपना बलिदान मुझे दो, मेरे समक्ष नतमस्तक होओ. मुझ को ही अपना केंद्र बना लेने और मुझे ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य मान लेने से तुम मेरे पास आ जाओगे.

श्लोक दीवार पर लिखे जाने के समय मालिनी की आंखों में कुछ चमका था. हमने पूछा क्या हुआ तो वो बोलीं, ” मैंने अपने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि मेरे प्रिय भगवान और गीता का मेरा प्रिय श्लोक इस भाव में मेरे घर की दीवार पर होगा. मैं भावुक महसूस कर रही हूं.”

मालिनी और मंजूनाथ के घर से हम ढेर सारा आशीर्वाद लेकर अपनी राह चल पड़े ये सोचते हुए कि हमने भी कला को अपना सर्वस्व देने का फैसला किया है ताकि हम भी उसके पास तक पहुंच सकें.

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0 thoughts on “कुंडापुर में कृष्ण और अर्जुन

  • bahut sundar painting aur usse bhi jyada sundar hai iska sandesh. Mujhe ye soch he romanchit kar deta hai ki nayee- nayee jagah jaakar naye-naye logon se milna aur unko jindgai ka ek choota hissa ban jana (painting ke roop me),wah!!

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