कश्मीर तो खुद ही एक पेंटिंग है

artologue1अभी हम श्रीनगर पहुंचे नहीं थे. शहर के बाहर पहली रेड लाइट पर रुके थे. बगल में रुकी स्कूटी, मोटरसाइकिल वाले कभी हमें देखते…कभी हरी बुलेट को. बायीं तरफ स्कूटी पर बैठा आदमी मुस्कुरा रहा था. हम भी मुस्कुरा दिए. बत्ती हरी हुई और हम बढ़े.

स्कूटी पीछे पीछे आई…..कहां से आए हो दिल्ली से..हमने कहा हां….बुलेट पर ही. …हां..मस्त लाइफ है यार…

ऐसे ही घूमते हो…हां….मीनाक्षी पेंटिंग करती है और हम लोगों के घरों में रुकते हैं….अरे वाह तुम लोग तो बढ़िया आदमी हो..

बातें होते होते दसेक मिनट गुज़र गए. फिर स्कूटी वाले ने कहा- आप प्लीज़ मेरे साथ एक कॉफी पीजिए.

हमने हामी भरी क्योंकि शहर में आ चुके थे. पास के रेस्तरां में गए तो कॉफी के बदले उन्होंने लंच ऑर्डर कर दिया.

नाम नज़ीर मलिक…काम-कंस्ट्रक्शन का….हमने अपने बारे में बताया. बहुत खुश हुए बोले- मुझे आपके जैसे लोग बहुत पसंद हैं. एकदम बढ़िया लाइफ स्टाइल है. मेरा घर बन रहा है. वर्ना पेंटिंग भी करवाता. आपसे फिर मिलूंगा मैं.

खाते खाते बातें होने लगी तो बोले- मैं भी घूमना चाहता हूं लेकिन……वो रुक गए.

मैंने पूछा बोलिए क्या कहना चाहते हैं…..बोले- जब हम लोग बाहर जाते हैं और जैसे ही किसी को बताते हैं कि कश्मीर से हैं तो ……….उनको शक होता है कि हम लोग भी आतंकवादी न हों.

मैं चुप रहा……हामी भरी. मैं जानता था ये सच है. हम सभी लोगों के दिमाग में कश्मीर से आए किसी व्यक्ति की पहली छवि उग्रवादी की ही उभरती है.
वो जो राह चलते लोगों को बुलाकर लंच करवा देते हैं.. है न अजीब सी बात
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हम जिनके यहां रुके थे उनसे हम चार साल पहले मिले थे. उनके पास गाड़ी है जो हमने किराए पर ली थी. ये 2010 की बात है. तब हमारी शादी हुई ही थी. हम हाउसबोट में रुके थे. तब भी वो हमें अपने घर ले गए थे और खूब खातिर की थी.

वो तब से कहते अब कभी भी श्रीनगर आओ तो हमारे यहां रुकना.

इस बार हम उनके यहां रुके. उनके बच्चे वसीम और इरम बड़े हो गए हैं…वसीम बारहवीं में है और इरम नवीं में.

दोनों को हनी सिंह के गाने पसंद हैं और वसीम बड़ा होकर सिंगर बनना चाहता है. वो गाता भी अच्छा है.

घाटी में भारतीय सीरियल्स खूब देखे जाते हैं. सास बहू वाले.

वसीम ने ही श्रीनगर घुमाया तीन चार दिन जब तक रहे.

वही खाया जो वो खाते…सुख दुख की बातें करते लेकिन जब पेंटिंग की बात आई तो उन्होंने मना कर दिया.
बोले- हमारा घर सफेद है और मुझे ऐसा ही अच्छा लगता है.

बच्चे शायद चाहते थे कि हम कुछ पेंट करें.

शायद…….कश्मीर में लोग आपको अपने मकानों में आने देते हैं .. घरों में नहीं…..वो आपको दिमाग में जगह देते हैं …दिलों में नहीं…ये रिश्ता कुछ कुछ वैसा ही है जैसा कश्मीर का भारत के साथ है……वो एक ही समय में भारत की आलोचना भी करते हैं लेकिन भारतीय टूरिस्टों के साथ उनके जैसा प्रेमपूर्ण बर्ताव शायद ही कहीं और किया जाता हो.
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कश्मीर में पेंटिंग के लिए परिवार मिलने में शुरु से ही दिक्कत हो रही थी. कई दोस्तों ने अपने कुछ और दोस्तों का नंबर दिया. उनसे बात भी हुई थी.

ये दिल्ली बंगलौर रहने वाले कश्मीरी थे. उन्होंने आगाह किया था कि कश्मीर में लोग उतने खुले नहीं हैं जितना आप समझ रहे हैं.

मुझे उम्मीद थी कि आशंकाओं के बावजूद पेंटिंग हो जाएगी. एक कश्मीरी ब्राह्ण का परिवार मिला भी जो द हिंदू में हमारे बारे में रिपोर्ट पढ़ चुका था.

वो निशात बाग के पास रहते हैं लेकिन जिस दिन हम श्रीनगर पहुंचे उसी दिन उनके दिल्ली के कारखाने में कोई दिक्कत आ गई.
उन्हें वापस आना पड़ा और हमारा काम रुक गया.

कुल मिलाकर पेंटिंग नहीं होनी थी कश्मीर में नहीं हुई…लेकिन ये भी अच्छा हुआ.

कश्मीर खुद ही एक पेंटिंग है जिसे हम मिस नहीं करना चाहते थे.

हमने सारी शामें डल झील पर बैठ कर बिताईं. शिकारे में घूमते रहे.परी महल, दाछीगाम, हरवन पार्क, शालीमार-निशात, हाउसबोट, उमर अब्दुल्ला का गोल्फ कोर्स …सब देख डाला.

हम खुश थे..पेंटिंग की आपाधापी में ये छूट जाता. कश्मीर में पेंटिंग नहीं हुई लेकिन कश्मीर नाम की पेंटिंग हम देख आए.

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